Thursday, July 7, 2011

मिथिलाक संस्कृति:किछु अप्रिय बिन्दु अरविन्द ठाकुर

मिथिला वर्तमान मे एकटा मिथक मात्र अछि|आइ ने एकर कोनो भुगोल अछि आ ने कोनो संवैधानिक अस्तित्व|अत्योक्ति नहि होयत,जँ कही जे मिथिले जकाँ मिथिलाक संस्कृति सेहो एकटा मिथके अछि|राज्याश्रयी विद्वतजन द्वारा लिखल आ शिक्षा-व्यवसाय सँ जुड़ल पंडितजन द्वारा बेर-बेर दोहरायल गेल ओहि तथाकथित स्वर्णिमकालक गौरवशाली अध्याय सभक वर्तमान मे कोनो अवशेष-प्रमाण नहि देखाइत अछि|एकांगीए सही,भूत मे जँ आगि रहय त वर्तमान मे छाउर देखाइ पड़बाक चाही ने?

विदेह माधवक आगमन आ हुनक पुरोहित गोतम रहुगण द्वारा अग्नि प्रज्ज्वलित कए भूमिक पवित्रीकरण सँ एहि आलोच्य क्षेत्र मे आर्यसंस्कृतिक सूत्रपात मानल जाइत अछि|एहि सँ पूर्व एकरा द्रविड़-किरातक मिश्रित संस्कृतिक स्थल अथवा व्रात्यलोकनिक निवास-स्थल मानल जाइत रहल अछि|व्रात्यलोकनिकेँ आर्य मानबाक आग्रह सेहो किछु इतिहासकारक छनि|एहि आर्यीकरणक पश्चात वर्ण-व्यवस्थासँ जाति-व्यवस्था,समाजसत्ताक प्रभुत्वसँ व्यक्तिसत्ताक प्रभुत्व,परिवर्तनशीलतासँ जड़ता आ उदारतासँ कट्टरता धरि पहुँचैत एहि क्षेत्रक समाज इतिहासक कोन-कोन अन्हार-इजोतक खोह सभमे ढुकैत-बहराइत वर्तमान धरि पहुँचल अछि,ताहिपरसँ एखनो बहुत रास आवरण सभ हटब बांकिए अछि|इतिहास जँ रस्ता देखबैत अछि तँ रस्ता भोतियाबितो अछि|ओहुना इतिहास पर शासक-समाजक वर्चस्व रहल अछि आ कोनो कालमे आम-अवामक की स्थिति छलय ताहिपर इतिहास सभ आन्हरे सदृश्य रहल अछि|राज्याश्रयी विद्वतजन केँ जनसमाजक स्थिति-चित्रणक ने बेगरता रहनि आ ने पलखति|तेँ इतिहासक भूल-भुलैयामे घुसलाक बादो आ बेर-बेर ‘खुल जा सिमसिम’कहलाक बादो कएकटा चोरदरबज्जा अदृश्य आ कएकटा दरबज्जा बन्द भेटैत अछि आ तेँ हमरासभक सोच-विचार एकटा अनिश्चितताक बिरड़ोमे पताबय लागैत अछि,स्थिर नहि भए पबैत अछि|जनसमाजक दुख-सुखक महासागरमे जा डुबकी नहि मारल जाएत,संस्कृतिक मोती कि पाथर कोना भेटत?ओम्हर हमर सभक शिक्षातन्त्र सेहो इतिहासक पाठ्य-पुस्तक आ अपन बनायल विचार-परिधिसँ बाहर जयबाक अनुमति नहि दैत अछि|सृजनात्मक लेखन यथास्थितिक बैरी मानल जाइत अछि आ तेँ जखन-जखन एहन प्रयास होइत अछि त विरोधीक रुपमे शिक्षातंत्रक संग-संग लाठी-फ़रसा लएकए तैयार मिथिलाक रुढिवादी आ यथास्थितिवादी तत्व ठाड़ भेटाइत अछि|किन्तु सृजनात्मक लेखनक प्रतिनिधि सुच्चा साहित्यकार प्रतिरोध आ असहमतिक संस्कृतिक संवाहक होइत अछि आ तेँ ओकरा शिक्षाव्यवसायी-पन्डितलोकनिक बिरादरीसँ फ़राक अपन सोच आ लेखन दुनूमे रचनात्मक दुस्साहस करैए पड़तै आ मिथिलाकेँ आइ एहने दुस्साहसी सभक बेगरता छै| बेगरता छै जे परम्परा आ लीकसँ हटि इतिहास आ संस्कृतिक अज्ञात-अबूझ पक्षसभक ईमानदार उत्खनन कएल जाय|बेगरता छै जे यथास्थितिक बिषायल सस्सरफ़ानीमे फ़ँसल संस्कृतिक व्यापकताकेँ बाहर आनल जाय आ अभिव्यक्तिक सभटा खतरा मोल लेल जाय|जँ कोशीक रत्न साहित्य-संस्कृतिक अग्रदूत संतकवि लक्ष्मीनाथ गोसाइकेँ राज्याश्रयजीवी सम्पादक-संकलक मैथिली कवि नहि मानैत छथि त बेगरता छै जे एकर विरोधमे बगावत हेबाक चाही-मठ,मठाधीश आ मठसैन्यकेँ धराशायी करबाक हद धरि|बेगरता छै जे संस्कृतिक नव इतिहास लिखल जाय|मिथिलाक महान विभूति राष्ट्रकवि दिनकरक कहब छनि-“साहित्यक ताजगी आ बेधकता जतेक शौखिया लेखकमे होइत अछि,ओतेक पेशेवरमे नहि|कृतिमे प्राण ढारैक दृष्टान्त बरोबरि शौखिया लेखके दैत छथि|थरथराहटि,पुलक आ प्रकम्प,ई गुण शौखिएक रचनामे होइछ|पेशेवर लेखक अपन पेशाक चक्करमे एना महो रहैत छथि जे क्रान्तिकारी विचारकेँ ओ खुलिकए खेलय नहि दैत छथि|मतभेद भेलहु पर ओ हुकुम,अंतत:,परम्परेक मानैत छथि|संस्कृतिक इतिहास शौकिये शैलीमे लिखल जाए सकैत अछि|इतिहासकार,अक्सर,एक वा दू शाखाक प्रमाणिक विद्वान होइत छथि|एहन अनेक रास विद्वानक कृति सभमे पैसिकए घटना आ विचार सभक बीच सम्बन्ध बैसयबाक काज वएह कए सकैत अछि ,जे विशेषज्ञ नहि अछि,जे सिक्का,ठीकरा आ ईंटाक गवाहीक बिना नहि बाजबाक आदतक कारणें मौन नहि रहैछ|सांस्कृतिक इतिहास लिखबाक, हमरा बुझने दूएटा मार्ग अछि|या त वएह बात धरि महदूद रही,जे बीसो बेर कहल जाए चुकल अछि आ,एना,अपनो बोर होउ आ आनोकें बोर करू;अथवा आगामी सत्यक पुर्वाभास दिअओ,ओकर खुलिकए घोषणा करू आ समाजमे नीम-हकीम कहाउ,मूर्ख आ अधकपारीक उपाधि प्राप्त करु|”

ई दू-टूक कहल जयबाक चाही जे कोनो क्षेत्रक संस्कृति ओहि क्षेत्रक राजा अथवा शासकक बपौती नहि होइछ|संस्कृति होइछै समाजक,जाहिमे शासक-शासित,राजा-प्रजा सभ सन्निहित छै|दोसर शब्दमे संस्कृतिक मात्र आ एकमात्र श्रोत वा केन्द्र मनुष्य आ ओकर जीवन अछि| मनुष्यक समाज ,ओकर सामाजिक संरचना,ओकर खान-पान,रीति-रिवाज आदिक सम्मिलित स्वरूप एहि संस्कृतिक निर्माण करैत अछि|एकरे पसारसँ एकटा क्षेत्र-विशेष अपन एकटा अलग पहचान विकसित करैत अछि जे ओहि क्षेत्र-विशेषक संस्कृति कहल जाइछ|तेँ कोनो क्षेत्रक संस्कृतिक उत्स ओहि क्षेत्रमे रहनिहार मनुष्य,ओकर समाज आ ओकर सामाजिक संरचनामे खोजल जयबाक चाही|

देशक अन्य भूभाग जकाँ एतहु आर्यलोकनि आर्येतर जाति संग मिलि जाहि समाजक रचना कयलनि सएह आर्य अथवा हिन्दूलोकनिक बुनियादी समाज भेल आ आर्य-आर्येतर संस्कृतिक मिलनसँ जे संस्कृति जनमल से एतहुका बुनियादी संस्कृति भेल|ई जे बुनियादी समाज भेल,तकर सुसंचालन लेल वर्णाश्रम-व्यवस्था बनल जे कालान्तरमे जाति-व्यवस्थामे परिणत भेल|तेँ मिथिलाक संस्कृतिक यथार्थकेँ बुझबाक लेल देवालय,पोखरि,माछ,मखान,पान आ पाग आदि-इत्यादिक बाइस्कोप देखयसँ पहिने एहि वर्ण-वर्ग-जाति व्यवस्थाक व्रणकेँ फ़ोड़ब आ निर्ममतासँ एकर खैंटी उतारब बहुत आवश्यक अछि|ई पीड़ा देत,दुर्गन्ध पसारत,मुदा एकरा निर्मूल करबाक लेल अथवा वर्त्तमान सामाजिक-आर्थिक परिस्थितिक आवश्यकतानुसार नवीकृत (renewal)करबाक लेल ई जोखिम लेबहि पड़त|मिथिलाक संस्कृतिक प्राचीन निरन्तरताक खूबी-खामीकेँ बुझबाक लेल आ वर्तमान चुनौती सभसँ जुझैत भावी उत्कर्ष पर लए जएबाक लेल एहि व्यवस्थाक संकल्पना,एकर बीजारोपण व सिंचन सँ लएकए एकर पुष्पित-पल्लवित होइत,मौलाइत,क्षरण दिस जाइत आ रोग-दोषसँ ग्रसित भए वर्त्तमानक निकृष्टतम रूप धरि पहुँचैक सम्पुर्ण प्रक्रियाक वैचारिक शल्य-चिकित्सा(चीड़-फाड़) बहुत अनिवार्य भए गेल अछि|एहि समुद्रमन्थनसँ विष बहरयबाक संभावना सेहो अछि किन्तु सामाजिक सत्यक अमृत प्राप्त करबाक लेल ई जोखिम लेबए पड़त|जाधरि एहि सामाजिक संरचनाक रोग-दोषकेँ नीकसँ बूझल नहि जेतैक ताधरि ने एकर कायाक सम्मानजनक नाश सम्भव छै आ ने एकर कायाकल्पक कोनो सम्भावना छै|मिथिले नहि,सम्पूर्ण भारतीय समाजक सांस्कृतिक उत्थान-पतनक जड़िआठमे इएह वर्ण सँ रुपान्तरित जाति-व्यवस्था अछि|

विदेह माधव एलाह,हुनक पुरोहित गोतम रहुगण अग्नि प्रज्ज्वलित कएलनि,आवश्यकतानुसार जंगल-झाड़ जराओल गेल,खेती योग्य समतल भूमि बनाओल गेल,समाज सभ्यता आ विकास दिस अग्रसर भेल|आर्य-अनार्यक सम्मिलन सँ बनल मिनजुमला संस्कृति विकसित भेल|कालक्रममे एकीकृत आ व्यवस्थित समाजक रचनाक्रममे परिवर्तनीय वर्णाश्रम-व्यवस्था विकसित भेल|ई वर्णव्यवस्था अपन समयक सर्वाधिक वैज्ञानिक आ व्यावहारिक समाजव्यवस्था छल जखनकि विश्वक अनेकानेक भूभाग तखनो अविकसित आदिम अवस्थामे पड़ल छल|ई व्यवस्था सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक चारि खाम्हबला सशक्त अधिरचना छल|एहि वर्णसमाजमे सामाजिक श्रम,सामाजिक रक्त-सम्बन्ध एवम सामाजिक विचारक नियम परिवर्तनीय छल|सामाजिक व्यक्ति अपन योग्यता,क्षमता आ अभिरुचिक अनुसार सामाजिक श्रमकेँ अंगीकार कए अपन जीवनयापन लेल ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शुद्रक रोजगारमूलक चक्रसँ अपन वर्ण आ श्रम-प्रकार चुनि ओहिमे अपन प्रतिभा आ सामर्थ्यक सदुपयोग आ प्रदर्शन करबाक लेल स्वतन्त्र छल|ओ अपन रागात्मक आकर्षणक आधार पर रक्त-सम्बन्ध स्थापित कए सामाजिक व्यक्ति बनबाक लेल स्वतन्त्र छल|ओ प्रत्येक सामाजिक पहलू पर निर्भीकतापुर्वक अपन विचार व्यक्त करबाक लेल स्वतन्त्र छल|अपन प्रकृतिमे पूर्ण समाजवादी वर्ण-समाज प्राकृतिक सन्साधन पर बेसी आ सामाजिक श्रमसँ अर्जित साधन पर कम निर्भर छल|प्रत्येक व्यक्तिक रोटी आ आजादीक गारन्टी छल|सृजनात्मक संस्कृतिसँ आलोकित ओ काल ताधरि रहल जाधरि ओहि व्यवस्थामे परिवर्तनशीलता रहलै|जँ देखल जाय त सामासिक संस्कृतिक बीजारोपण आ ओकर तीव्र विकासक ओएह कालावधि छल|एहिकालमे सामाजिक श्रम-संस्कृतिक महत्ता त स्थापित भेबे कएल;महासागर,वनप्रदेश,गिरिप्रदेश,मरुप्रदेश,हिमप्रदेश,आकाश आदि पर विजय प्राप्त कए ओकरा अपन अधीन करबाक घातक प्रवृतिक जगह पर ओकरा अपन मित्र बनाए ओकर संरक्षण करबाक संस्कार सेहो जन-जनमे विकसित भेल|देहक नश्वरता आ आत्माक अमरताक सिद्धान्त मनुष्यकेँ अपन भावी पीढीक भविष्यसँ जोड़लक|ई ओ समय छलै जखन विद्यानुरागी आ विद्वानकेँ ब्राह्मणत्व भेटैत छलै,अजुका जँका नहि जे ब्राह्मण वन्शमे जन्म लेलहु त विद्वान होयबे करब|ई ओ समय छलै जखन रणकौशलमे निपुणता क्षत्रियत्वक पैमाना होइत रहय,अजुका जकाँ नहि जे ओहि कुलमे जनमलहुँ त वीर होयबे करब|

एकरा जनसंख्याक दबाव कही,वा तत्कालीन समाजक समयगत बाध्यता जे वर्णाश्रम अधिरचनाक परिवर्तनशीलता अपन निरन्तरता कयम नहि राखि सकल आ तकर परिणामस्वरूप अपरिवर्तनीय जन्मना जाति-व्यवस्था अस्तित्व मे आयल|समाज-सत्ताक क्षरणस्वरूप व्यक्ति-सत्ताक बढैत वर्चस्व सेहो एकटा कारण भए सकैत अछि|इएह जन्मना जातीय समाज हमरा सभक वैभवशाली मानवीय संस्कृतिक क्षरणक महत्वपूर्ण कारक भए गेल अछि|

जाहि मिथिक नाम पर मिथिला बनल आ जनक वंशक स्थापना भेल,जाहि विदेहकेँ मनु महराज ‘वैश्य द्वारा ब्राह्मणीक गर्भसँ उत्पन्न सन्तान ‘ कहय छथि आ जेकर वर्गीकरण व्रात्यक रुपमे सेहो होइत अछि,ताहि वंशक सीरध्वज जनकक सभामे ‘जनक(वैदेह)वस्तुतः जनक(पिता)छथि’कहैत आ’जनक-जनक‘ उच्चरित करैत ब्रह्मविद्याक ज्ञान लेबाक लेल विद्वतजन सभ दौगैत छलाह|विश्वामित्रक श्रेणी क्षत्रियक छलनि मुदा हुनक प्रबल विद्यालोलुपता अंततः हुनका ब्रह्मर्षिपद उपलब्ध करबैलकनि|अऊँठा कटबाइओकए एकलव्य प्रमाणित कयलनि जे धनुर्विद्यामे पारंगत होएबाक लेल क्षत्रिय होयब त कात जाय दिअ,गुरू आ ब्राह्मणक सदेह उपस्थिति अथवा शिक्षा कतहुसँ आवश्यक वा अनिवार्य नहि अछि|शंबूक अपन घेंट कटबयसँ पहिने विद्वान होएबाक लेल ब्राह्मण होएबाक अनिवार्यताकेँ आधारहीन प्रमाणित कए चुकल छलाह|

अपरिवर्तनीय जन्मना जाति-व्यवस्था धरि अबैत-अबैत हमरा सभक समाज कवचमे बन्द घोंघा सदृश्य भए गेल|ई कवच छल पुर्वाग्रहक|जाति-प्रथासँ उपजल एहि स्थितिक मादे समाजविज्ञानी जवाहरलाल नेहरूक कहब छनि जे’भारतमे दुनू बात एके संग बढल|एकदिस त विचार आ सिद्धान्त मे हम सभ बेसी सँ बेसी उदार आ सहिष्णु होएबाक दाबी कएलहुँ|दोसरदिस,हमरसभक सामाजिक आचार अत्यंत संकीर्ण होइत गेल|ई फाटल व्यक्तित्व,सिद्धांत आ आचरणक ई विरोध,आइधरि हमरासभक संग अछि आ आइओ हमसभ ओकर विरुद्ध संघर्ष कए रहल छी|कतेक विचित्र बात अछि जे अपन दृष्टिक संकीर्णता,आदत आ रिवाज आदिक कमजोरीकेँ हमसभ ई कहि अनठिआए देबए चाहैत छी जे हमरासभक पुरखा बड़का लोग छलाह आ हुनकर बड़का-बड़का विचार हमरासभकेँ विरासतमे भेटल अछि|किन्तु,पुरखासभसँ भेटल ज्ञान आ हमरासभक आचरणमे भारी विरोध अछि आ जाधरि हमसभ एहि विरोधक स्थितिकेँ दूर नहि करब,हमरासभक व्यक्तित्व फाटल के फाटले रहि जाएत|’नेहरूक ई कथन मिथिलो पर अक्षरसः लागू होइत अछि|अपरिवर्तनीयता आ जन्मना-एहि दुनू सुरक्षा-कवचसँ संरक्षित मिथिलाक मार्गदर्शक वर्ग आत्ममुग्धता,आलस्य आ मुफ्तखोरीकेँ अपन हक मानि लेलक|श्रेष्टताबोधक पाखंड मिथिलाक ग्रहणशक्तिकेँ गीलि गेल|’जे हम छी,हमरा लग अछि,सएह सर्वश्रेष्ट अछि’क डपोड़शंखी मानसिकता बाहरसँ उत्कृष्टतम चीजहुँकेँ लेब अस्वीकार करए लागल|विदेशी आक्रांतासभक शासनाधीन नहि रहितय त अनेकरास कला,शिल्प,तकनीक,विधा जे विदेशीसभक संग आयल छल,मिथिला समाज तकरोसँ वंचित रहि जैतय|ई मजबूरीमे ग्रहण कएल गुणसभ छल जे हमरासभक गंग-जमुनी संस्कृतिकेँ समृद्ध कयलक,जकरापर आइ हमसभ गर्व करय छी|

कोशी नदी मिथिलाक नम्हर भूभागक भाग्यनियंता रहल अछि|एकदिस ई हमरासभक धार्मिक-सांस्कृतिक भौतिक धरोहरसभकेँ नष्ट-भ्रष्ट कयलक अछि त दोसरदिस एकरे चलतबे अपरिग्रह आ संघर्षक संस्कृति निर्मित आ विकसित भेल जेकर सीधा लाभ सामान्य जन-समाजकेँ भेटल|विशिष्ट जन-समाज एहि संस्कृतिसँ अलगे-थलग रहबामे कुशल मानलनि|जँ संघर्ष-संस्कृतिकेँ सर्वस्वीकृति भेटल रहितय त क्षत-विक्षत लोकजीवनक जीजीविषाक परिणामस्वरूप शासनमे आयल खेतिहरसमाजक प्रतिनिधि गोपाल आ सत्ताक निरंकुशताक विरुद्ध जनांदोलन कए शासनमे आयल भीम केवट निर्विवाद नायकक सूचीमे होयतथि|

हमसभ जाहि आर्य-आर्येतर सभ्यता-संस्कृतिक संवाहक मानल जाइत छी ओ समन्वयवादी,सामासिक,समावेशी संस्कृति छल|आर्य मनीषी लोकनि हमरासभकेँ ’वसुधैव-कुटुम्बकम’क मंत्रसँ सिक्त कएने छलाह|इएह संस्कृति छल जे सनातन धर्मकेँ एतेक विस्तार देलक|एहि सनातन-सागरमे आबि विदेशी आक्रांतासभक सैकड़ो रक्त-समूह भारतीय भए गेल|सनातन धर्मक विस्तार हमरसभक संस्कृतिओकेँ निरन्तर समृद्ध कयने गेल|सम्पूर्ण मिथिलाकेँ प्रमुखतः सनातनी मानल जाइत अछि|किन्तु,आइ हमसभ ई स्वीकार करी जे हमसभ अपन पूर्वजक नीक,इमानदार आ सुयोग्य उत्तराधिकारी प्रमाणित नहि भए सकलहुँ आ ओहि सनातन-सामासिक संस्कृतिकेँ अक्ष्क्षुण्ण नहि राखि सकलहुँ|जे समाज अपन धूर विरोधी बुद्धकेँ अपन अवतार घोषित करबाक उदारता देखयलक,वएह समाज मैथिल-महासभाक आयोजक भेल|जाहि बौद्धिक वर्ग पर वर्ण-जाति संरचना-संरक्षणक भार छलय सएह वर्ग परम स्वार्थी बनि अपन रक्त-शुद्धताकेँ रेकर्डेड करयबाक उताहुलतामे पंजी-प्रवन्धक व्यवस्था कए लेल|वेदव्यास एतेक ध्यान राखलनि जे’चातुर्वर्ण्य मया सृज्यते’कृष्णावतार-मुखसँ कहबएलनि,मुदा सत्ता-संरक्षणक आत्ममुग्धतामे पंजी-प्रवन्धक औचित्य लेल कोनो लोकलाजक पालन नहि कएल गेल|”मिथिला”आ”मैथिल”शब्दक प्रयोगकेँ हमसभ जतेक विराट आ व्यापक अर्थवत्ता प्रदान करिऔक,एहि दुनू शब्दक अर्थ आम-अवाममे की लगाओल जाइ छै,से ककरोसँ नुकायल नहि अछि|एतय मिथिलाक सामाजिक बुनावटक रग-रग चिन्हयबला साधु-जनकवि वैद्यनाथ मिश्र यात्री जीक एकटा लेखक अंश देब समीचीन बुझाइत अछि-“मैथिल महासभाक सिद्धान्तानुसार मैथिल ब्राह्मण तथा कर्ण कायस्थ(!)मात्र सुच्चा मैथिल थिकाह|मिथिलाक सीमाक भीतर बसैत,मिथिलाक अन्न-जलसँ निर्वाह करैत,विशुद्ध मैथिली बजैत भूमिहार-क्षत्रिय आदि अन्य जातीय यदि क्यो अपनाकें मैथिल कहताह तँ जातीय महासभा नांगरि ठाढ क क हुनका दिस बधुआएत,मुँह विजकौत|परिणामस्वरूप हुनका लोकनि अपना घर-आंगनमे व्यवहृत भाषा-ठेठ मैथिलीकें मैथिली कहबामे अपन हेठी बुझै लागल छथि|’हम मैथिल नहि,बिहारी थिकहुँ’-ई भावना हमरा लोकनिमे जाहि तेजीसँ पसरि रहल अछि,से देखि एहन कोन मैथिल हृदय हैत जे आहत नहि भ रहल हो?मिथिलेश-सुधारक मिथिलेश(?)जाहि संस्थाक कर्णधार होथि,तकर एहि प्रकारक संकुचित सिद्धांत देखि मिथिलाक लाख-लाख अधिवासी-जे मैथिल होइतहुँ मैथिल नहि,क्षुब्ध अछि|चिरकालसँ अपनहि घरमे,अपनहि बन्धु-वर्गक द्वारा ठोंठिऔल गेल मिथिलाक सन्तान आइ यदि आजिज आबि अपनाकें बिहारी कहब आरंभ कैलक अछि तँ एहिमे केकर दोष?’महासभा’क कतोक सदस्यक मनमे घुरि-फिरि ई बात अबैत हेतैन्हि जे मिथिलाक सकल अधिवासीकें मैथिल मानि लेला सँ मैथिलत्वक अग्रगण्य अंगमे धार्मिक वा समाजिक धक्का लगवाक सम्भव|” यात्री जीक ई विचार आइ सँ 73वर्ष पहिने विभूति,फरवरी 1938 अंकमे छपल छल|एहि स्थितिमे आइओ कोनो सकारात्मक परिवर्तन नहि भेल अछि,उन्टे बिगड़ले अछि|

वर्ण-व्यवस्थाक बिगड़ल निकृष्ट रूप जाति-व्यवस्थाक औचित्य-अनौचित्य पर घमर्थन होइत रहल छै,होइत रहतै,मुदा एहि यथार्थसँ मुँह नहि मोड़ल जाय सकैत अछि जे मिथिलाक सांस्कृतिक उत्थान-पतनमे ई व्यवस्था अनिवार्य आ महत्वपूर्ण कारक रहल अछि आ रहत|आल्हा-रुदल,नैका-बनिजारा,लोरिकायण,भगैत आदिक जे लोकगायनक संस्कृतिक परम्परा रहय अथवा छै,तकर निर्वहनमे आइ धरि केओ द्विज किऐक नहि एलाह?ई ठेकेदारी की मात्र सोल्हकनक छिअय?मैथिली मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक भाषा छै आ एहिसँ सम्बन्धित सभटा संस्था-पुरस्कार पर इएह दुनू जातिक आधिपत्य छै-एहि आरोपक कोनो प्रायोगिक खण्डन आइ धरि किऐक नहि भए सकल?भाषा सेहो संस्कृतिक आवश्यक आ अविभाज्य अंग छै|जँ भाषा समावेशी नहि हएत त समावेशी संस्कृति कोना विकसित हएत?

ई प्रसन्नताक गप अछि जे जँ राजनीतीक क्षेत्रकेँ छोड़ि दी त सामाजिक जीवनमे जाति-पातिक महत्ता समाप्त प्रायः छै|एकर कारण खुलल अर्थव्यवस्थाक नीती होअय,भौतिकवादी होड़ होअय वा एहि दुनूक चलतबे बढल जीवन-संघर्ष,किन्तु जाति-पाति अजुका लोकक विचार-सूचीमे बहुत नीचाँ छै आ मात्र चुनावेक बेरमे शीर्ष पर आबय छै|तेँ समरसताक संस्कृतिकेँ फिलबक्त सतह पर कोनो खतरा नहि देखाइत अछि|एहि क्षेत्रक ऊर्वर माटि-पानिमे सामासिक संस्कृतिक बीआ तेहन सघन छीटल छै जे बेमुरव्वत मौसम आ लापरवाह किसानक अछैतहुँ ई पनुकैत रहय छै,फसिल दैत रहय छै आ एतहुका वासीकेँ जीवित आ गतिवान बनेने रहैत छै|किन्तु कतहु गहींरमे आगि भए सकैत छै|तेँ समयक तगादा छै जे वर्त्तमानमे जातीय-व्यवस्थाकेँ कोनो तार्किक आ वैज्ञानिक निष्कर्ष धरि आनल जाय,अन्यथा सांस्कृतिक उत्कर्षक लक्ष्य पायब सन्देहास्पद अछि|जवाहरलाल नेहरु कहने छलाह-“आइ हमरासभक समक्ष जे प्रश्न अछि,ओ मात्र सैद्धांतिक नहि अछि,ओकर सम्बन्ध हमरसभक जीवनक सम्पूर्ण प्रक्रियासँ अछि आ ओकर समुचित समाधान आ निदाने पर हमरसभक भविष्य निर्भर करैत अछि|साधारणतः,एहन समस्यासभकेँ सोझराबयमे नेतृत्व देबाक काज मनीषी लोकनि करैत छथि|किन्तु ओसभ काज नहि एलाह| ओहिमे सँ किछु त एहन छथि,जे एहि समस्याक स्वरुपहिकेँ नहि बूझि पाबि रहल छथि|बकियासभ हारि मानि लेने छथि|ओ सभ बिफलता-बोधसँ पीड़ित आ आत्माक संकटसँ ग्रस्त छथि आ बुझिए नहि पाबि रहल छथि जे जीवनकेँ कोन दिशा दिस मोड़ब उचित होयत|”नेहरुक एहि निराश टिप्पणीक बाद वैश्विक समाजवादी चिन्तक एंजेल्सक ई वक्तव्य विचारणीय अछि-“कोनो खास आर्थिक संरचनाक समस्याक समाधान ओही संरचनाक नियम के अनुसार कएल जायब अनिवार्य अछि,जँ कोनो दोसर संरचनाक नियमसँ ओकर समस्याक समाधान कएल जायत त ओ बेजाय ढंगसँ विद्रूप भए जायत|”एंजेल्सक एहि कथनमे हमरासभक जातीय(आर्थिक)संरचनाक समस्याक समाधानक कुंजी नुकायल अछि|मिथिला आ भारतक लेल सांस्कृतिक संकटक कारण बनल जातिप्रथाक वर्त्तमान संकटक समाधान एहि जातिप्रथाक संरचनाक भीतरे अछि|एकरे नियमसँ एकरा युगानुरूप उपयोगी बनायल जाए सकैत अछि आ ई काज हमरेसभकेँ करए पड़त|मिथिलाक संस्कृतिक इएह तगादा अछि|मिथिला आ एकर संस्कृतिक उत्कर्षक इएह टा मार्ग अछि|

जीवनक जे अगिन-पथ के पार एताह

जीजिविषा मे से अजित,आजाद हेताह

बूड़ि,जे निष्ठाकेँ सदिखन मोन रखताह

सियासी खेल मे बरबाद हेताह

माथ अछि जिनकर सिंहासन के चरण पर

आम-जन के माटि मे ओ खाद हेताह

ओ वैधानिक अनुकम्पा के प्रावधानसँ

मूल भए सकलाह नहि,अनुवाद हेताह

अछि हुनक निर्माण मे कोनो खराबी

उच्छिष्ट छथि ओ,तेँ कोना उत्पाद हेताह

धन्य!’अरबिनतों एलह मैथिल गजलमे

फेर केओ खुसरो की तोहर बाद हेताह

Sunday, June 26, 2011

मैथिली गजल

क्लस्टर बम,प्रक्षेपास्त्र टामहाक हमरे छल
जीवित लहास बनल जे इराक हमरे छल
भारत,सोनार बंग आकि पाक हमरे छल
“एकोहंबहुस्याम”-ई मजाक हमरे छल
एखन भने परमाणु कचरा केर याचक छी
‘विश्वगुरु हम छी’-से वेदवाक् हमरे छल
गांधी छलहुँ जखन हमरे सुराज छल
दागी पर खादी केर झक पोशाक हमरे छल
हमरे ओ मुण्ड छल कटि गेल जे रैजकी सँ
बाजारक बीच पड़ल कान-नाक हमरे छल
हमरे छल डिडिर जे बाँटलक सहोदर केँ
अधरतिया आजादीक ढोल-ढाक हमरे छल
‘अरबिन’रहबैया छी रोगहा समाजक हम
लसनि जेकर लागल अछि से सुजाक हमरे छल